ऐसा होता है क्या

शाम का वक्त और ठंडी - ठंडी हवा चल रही थी, झूले पर झूलती मैं बहुत खुश थी, जब भी झूला ऊंचाई की ओर जाता 5 साल का मेरा मासूम मन खुशी से इठला उठता। यह सोच कर कि मैं दुनिया में सबसे ऊंचाई पर हूं, और फिर नीचे की ओर आना और उतनी ही तेजी से ऊपर की ओर जाना। ऊपर ,नीचे करते - करते ना जाने कब मेरे पैर उस झूले से लंबे हो चले , और वह बच्चों का झूला बन कर रह गया मेरे लिए।
मैं जब भी खेल कर वापस आती थी,मां कहती थी पढ़ाई करो और जब ना करती थी तो कभी-कभी माँ खाना ना देती थी।।
खाना ना देना तो फिर भी चल जाता था मगर वह अक्सर गुस्से में कह उठती थी , अपनी बड़ी बहन को देखो कितने अच्छे से पढ़ती है,और तुम्हारी वह दोस्तों इस बार फर्स्ट आई है। यह शब्द ही मुझे आहत कर देते थे, मानो ऐसे जैसे मेरा झूला आसमान की ऊंचाइयों पर हो और मां के शब्द मुझे धक्क...... से जमीन पर खींच लाए, मुझे हमेशा से यह कंपेयर किये जाने पर शिकायत थी। बड़ी बहन और दोस्त पढ़ाई में अच्छे होंगे तो रहने दो वह भी तो मेरी तरह अच्छी ड्राइंग नहीं करते।

माँ  ऐसा क्यों नहीं कहती  कि बड़ी बहन और दोस्त को मुझसे ड्राइंग सीखनी चाहिए। और पड़ोस वाली मासी भी तो मां से अच्छा खाना बनाती है,मैं तो कभी नहीं कहती मां को उनसे सीखना चाहिए ।
बस पढ़ाई के मामले पर ही सीखते हैं क्या?
आहहहह... मेरे उस वक्त मासूम मन की, मासूम बातें ।।लेकिन मां तो यह गुस्से में कहती थी, जैसे ही घर की चार दीवारों से कदम बाहर निकालकर आसमान की ऊंचाइयों को छूना चाहा , पता चला यहां लाखों लोग हैं जो सिर्फ तुलना, आत्मविश्वास , बुलंद ख्वाबों को शब्दों के माध्यम से तहस-नहस कर देते हैं।
Life is a race,if you don't run fast
You will be like a Broken andaaa
3 ईडियट्स फिल्म का यह डायलॉग मुझे आज भी विचलित करता है।
 या जिंदगी सच में एक दौड़ है ? और अगर यह दौड़ है तो कौन आगे है ? कौन पीछे? इसका फैसला कौन कर रहा है?  और रेस के अंत में जीता कौन? और हारा कौन?
 हार , जीत तो छोड़ो इस रेस का अंत कहां है?
जिंदगी एक रेस कैसे हो सकती है,जब सब की मंजिल अलग अलग है जो अपनी मंजिल तक पहुंच गए वो जीत गए और जो ना पहुंच सके वो हार गए
 क्या जीत हार जैसा कुछ होता भी है?
 जो अपनी मंजिल तक ना पहुंच सके वह हारते नहीं है ,समाज की नजरों में हार जाते हो
 मगर वह बहुत कुछ सीखते हैं,अपनी मंजिल हम खुद बनाते हैं, तो दूसरे कैसे तय कर सकते हैं हम उसको पाने में सक्षम हुए या नहीं? और जब मंजिल के निर्माता हम ही है तो क्यों खुद की दूसरों से तुलना करें।
 यह ईर्षा,आत्मविश्वास जैसी भावनाएं हमें नकारात्मकता के दरिया में डुबकी लगाने पर मजबूर कर देती है।
 मेरी मंजिल, मेरी कमियां,मेरी खुशियां, मेरी सफलताएं, मेरा आत्मविश्वास और हां मेरी असफलता मेरी सीख,
असफलता को अपनाना भी तो एक कला है ।
"मेरी" वैसे कभी - कभी स्वार्थी हो ना , कितना अच्छा है ना ।
यह हमें इस दुनिया की बेबुनियाद तुलनाओ से दूर रखता है।
वो बचपन वाला झूला आज भी याद आता है।
 काश! हम जिंदगी को एक रेस नहीं झूला समझ लेते। सब अकेले अपने-अपने झूले पर बैठते।
 कभी सफलताओं की ऊंचाइयों में इठलाते तो धककक से जमीन पर आजाने पर फिर उतनी ही क्षमता से ऊपर जाने की कोशिश करते।कभी ऊपर , कभी नीचे जिंदगी कोई झूला है क्या? 
पहले लगता था मेरे पैर उस झूले से बड़े हो गए , मगर अब लगता है, उस झूले का मेरी जिंदगी के साथ - साथ विस्तार होता रहा ।
और आसमान की ऊंचाइयाँ, इतनी ऊंची हो गई कि वहां तक  पहुंचते ही अब खुशी से उछलता मेरा दिल उँचाई से डर भी जाता है।
और नीचे धकककक से पटक जाने का डर और वापस ऊपर जा सकूँगी  या नहीं, यह सोचकर दिल घबराने लगता है।
यह जीवन का झूला कभी रुकता भी है क्या? कोई मंजिल भी है? ऐसा भी होता है क्या?